13 जून 2023, शिमला

मैं तीन दिन की विभागीय वर्कशॉप के लिए शिमला गया था। उस समय कॉलेज के 3 दोस्त विक्रांत गुलेरिया, प्रवीण ठाकुर और गगन दीप फौंटा भी शिमला में ही थे। इसलिए, एक बैठक का निर्णय लिया गया। 

बारिश भरा मौसम था तो यह एक दो बियर पीने का बिल्कुल उपयुक्त समय था। इसलिए हम मॉल रोड पर डिलाइट्स कैफे और बार में बैठे। बहुत सारी राजनीति पर चर्चा हुई। फिर ख्याल आया श्रीखंड यात्रा करने का जिसको मैं कॉलेज टाइम से प्लान कर रहा हूँ। "भाई श्रीखंड चलोगे?"... मेने कहा। तुरंत, चुनौती प्रेमी गगन दीप फाउंटा ने कहा, ठीक है मैं तैयार हूं..चलो चलते हैं। प्रवीण ठाकुर 2016 में एक बार जा चुके हैं तो उन्होंने भी सोच-विचार कर कहा, ठीक है हम ठीक से प्लान करेंगे। विक्रांत पी नहीं रहे थे और उन्हें ऊंचाई से डर भी लगता है इसलिए उन्होंने नहीं जाने का फैसला किया। शुरू में, मुझे प्रवीण और गागा पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि हम थोड़े से हाई थे और इतनी जोखिम भरी यात्रा की योजना बनाने या तय करने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन कुछ दिनों बाद गागा ने मुझे फोन किया और पूछा कि हम कब जा रहे हैं। मुझे यकीन नहीं हुआ की गागा इसके बारे में सीरियस था। अंतिम निर्णय लिया गया। 2 जुलाई 2023 हमारी यात्रा की शुरुआत होगी। हालाँकि, आधिकारिक यात्रा 7 जुलाई से शुरू होनी थी जब स्थानीय प्रशासन सब कुछ प्रबंध करता है।

आपको बता दूँ गागा शिमला ज़िले के चौपाल से सम्बन्ध रखते हैं और प्रवीण भाई कुल्लू ज़िले के अन्नी से हैं और यह दोनों स्नो बिल्ड डिज़ाइन एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज, शिमला के संस्थापक हैं। इसके अलावा प्रवीण भाई हिमाचल की सबसे लोकप्रिय क्रिकेट लीग सेराज कप क़े संचालक एवं कमेंटेटर भी हैं। और गागा पार्ट टाइम शायर हैं।        

हम तीनों 2 जुलाई को ठियोग, शिमला में फिर से मिले और गाड़ी में निरमंड की ओर निकल दिए। नारकंडा में प्रवीण भाई गाड़ी के स्टीयरिंग की कमान सँभालते हैं और सुपरसोनिक गति से निरमंड पहुंचा देते हैं। निरमंड से लगभग 20km दूर जाओं गांव है जहाँ से यात्रा की शुरुरात होगी। हमने कार जाओं में ही पार्क की और पैदल चल पड़े। श्रीखंड महादेव टॉप जाओं गांव से 33 किमी की पैदल दूरी पर है। जाओं में हर किसी से हर-हर महादेव और जय भोले शंकर के जयकारे सुनाई दे रहे थे। लौटने वालों ने भी हर-हर महादेव के जयकारे के साथ हमारे लिए मंगलकामना की।

 

जाओं गांव से थाचडू - यात्रा का पहला चरण 2 जुलाई 2023

शुरुआत में, मैंने इस यात्रा से जुड़े जोखिम को बहुत कम आंका था। सब कुछ नार्मल ही दिख रहा था और लोग सुरक्षित वापस आ रहे थे तो मेने भी मान लिया की ज़्यादा मुश्किल नहीं है। लोग बस कठिनाई को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। और वास्तव में, 90% यात्रा में ज़्यादा जोखिम नहीं है। नालों पर कुछ ग्लेशियर क्रॉसिंग हैं जो थोड़े मुश्किल हैं लेकिन इसके अलावा, पार्वती बाग तक अधिकांश लोगों के लिए ट्रेक करना काफी संभव है। पार्वती बाग़ से श्रीखंड टॉप तक रिस्क रहता है इसलिए कुछ लोग दूर से ही मथा टेक क़े वापस आ जाते हैं। न केवल गिरने का जोखिम, बल्कि अधिक ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, ठंड और बहुत लंबे समय तक बर्फ में फंसे रहने पर हाइपोथर्मिया या कार्डियक अरेस्ट होने का भी खतरा होता है।

शाम क़े करीब 4 बजे हम जाओं से चल दिए और कुछ ही देर में बराहटी नाला पहुँच जाते हैं। बराहटी नाले पर बहुत सारे साधु महाराज थे, जो भांग के पकौड़े तल रहे थे, लेकिन किसी को दे नहीं रहे थे। तो बिना पकोड़े खाये ही हम आगे बढ़ गए। बराहटी नाला से थाचडू तक, चढ़ने के लिए 90 डिग्री का पहाड़ है। इसी कारण से स्थानीय भाषा में इस पहाड़ को "डंडा पहाड़" कहा जाता है। बेशक, रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा है और लगभग 13 किमी चलना पड़ता है। डंडा पहाड़ घने जंगल वाला पहाड़ है। चट्टानों पर लाल तीर के निशान के साथ ऊपर और नीचे जाने का केवल एक ही रास्ता है, इसलिए रात को जंगल में खो जाने की कोई संभावना नहीं है, जब तक कि आप कुछ बेवकूफी न करें।

रास्ते में बहुत लोगों से मुलाक़ात हुई। वहाँ यू. ऐस. ऐ. (अप्पर शिमला एरिया) के लोगों का एक ग्रुप था। उनके साथ एक 50 वर्षीय अंकल जी थे जो की फॉर्मल ड्रेस के साथ चमड़े के जूते पहने हुए थे। अंकल जी थोड़े मज़ाकिया और चिल इंसान लग रहे थे तो क्यूरोसिटी में मैंने पूछ ही लिया, "भाई साब आपका दफ्तर कैलाश पर्वत पर है?" भाई साब मन ही मन गाली देते हुए बाहर से मुस्कुरा देते हैं। लेकिन अंकल जी को देख के ये तो साबित हो गया की इस यात्रा में फिटनेस के साथ साथ जिगरा भी चाहिए। उनका युवा लीडर, एक अत्यधिक मोटिवेटेड  और हाई टेस्टोस्टेरोन वाला बंदा, जिसने पहले ही 6 बार यात्रा करने का दावा किया था, हमारा मार्गदर्शन कर रहा था और अपनी यात्राओं का अनुभव शेयर कर रहा था। वह बीच में रुके बिना लगातार श्रीखंड टॉप तक चलने के मूड में थे इसलिए वे आगे बढ़ गए। हालाँकि, वे कालीटोप में रुके, जो थाचडू से 1 किमी आगे है।

 घना जंगल, रात का अँधेरा, कोहरा और तीन यात्री। अभी उन क्षणों को याद करता हूँ तो थोड़ा डर लगता है पर उस समय तो उन क्षणों को जी भर के एन्जॉय किया था।  हमारे व्लॉगिंग मैन प्रवीण भाई ने भी इस घने जंगल में 10-20 हज़ार रिटेक लेकर अपने व्लॉग के लिए काफ़ी क्लिप्स इकठ्ठा कर ली।  कदम दर कदम हम रात करीब 11:00 बजे थाचडू पहुँचे। प्लानिंग तो काली टॉप की थी लेकिन टाँगे लड़खड़ा रही थी तो हमने थाचडू में ही रात बिताने का फैसला किया। थाचडू 3600 मीटर की ऊंचाई पर एक शिविर है। हमे वहां एक टेंट मिल गया। टेंट वाले भाई साब ने खाना बहुत अच्छा बनाया था। इस यात्रा में आपको रहने और खाने की चिंता नहीं होगी। ऐसी कठिन परिस्थितियों में, टेंट वाले बहुत ही मामूली कीमत पर बेहतरीन गुणवत्ता वाला भोजन और रात में ठहरने की सुविधा प्रदान करते हैं। यदि आप कभी श्रीखंड की यात्रा करें तो कृपया उनसे मोलभाव न करें।

 हालाँकि, हमें बताया गया था कि श्रीखंड शिला की पहली झलक कालीटोप से दिखाई देती है, लेकिन मौसम असामान्य रूप से इतना अच्छा था कि हमे अगली सुबह थाचडू से ही श्रीखंड महादेव के दर्शन हो गए। सुबह 6:30 बजे हम थाचडू से आगे बढ़ने लगे।

थाचडू से श्रीखंड महादेव

                                                                                                  

थाचडू से पार्वती बाग़ - दूसरा चरण, 3 जुलाई 2023

हमने थाचडू से बहुत अच्छे मौसम के साथ शुरुआत की और महादेव से प्रार्थना की कि हमारी पूरी यात्रा के दौरान मौसम ऐसा ही बना रहे और महादेव ने भी हमारी बात सुन ली। यह यात्रा मानसून में की जाती है इसलिए इंद्र देव यात्रियों पर वर्षा कर ही देते हैं। लेकिन हम बेहद भाग्यशाली थे. अधिक ऊंचाई के कारण मौसम कभी भी ख़राब हो जाता है। कभी धूप, कभी बादल छाए, कभी कोहरा, लेकिन ऊपर की ओर हमारी पूरी यात्रा के दौरान बारिश नहीं हुई।

जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती गई, घना जंगल हरे भरे घास के पहाड़ में बदल गया। कुछ ही देर में हम कालीटोप पहुँच गये और कालीटोप डंडा पहाड़ का अंतिम छोर है। इसके बाद भीम ड्वार तक रास्ता कहीं उतराई वाला है तो कहीं चढ़ाई वाला। कालीटोप ऐसी जगह है जहाँ से इस यात्रा के सभी चेकपॉइंट्स को देखा जा सकता है। यहां से भीम ड्वार, बर्फानी धुंध के पीछे पार्वती बाग और स्वयं श्रीखंड महादेव भी दिख रहे थे।  

Kaali Top

काली टॉप में टेंट थे जिनके अंदर कुछ युवक आँखों पर कटे हुए आलू लगा के सोये थे। पता चला की वे बर्फ पर बिना धुप का चश्मा लगाए ऊपर चढ़े हैं। इसलिए मैंने भी यात्रा से लौटे एक व्यक्ति से धूप का चश्मा मांगा। उन्होंने मुझे चश्मा इस शर्त पर दिया कि मैं यात्रा पूरी करने के बाद इसे किसी और जरूरतमंद को दे दूंगा, जैसा कि जय हो फिल्म में सलमान खान ने किया था। धन्यवाद मत कहो. तीन लोगों की मदद करो और उन तीनो से कहना की तीन और लोगों की मदद करो।

हम चलते रहे, तस्वीरें खींचते रहे। भीम ड्वार से पहले भीम तलाई, कुंशा दो चौकियां हैं। श्रीखंड यात्रा की खास बात यह है कि आपको हर तरह की प्राकृतिक सुंदरता देखने को मिलती है जैसे घने जंगल, बैकग्राउंड में हिमालय के साथ हरे-भरे पहाड़, बड़े ग्लेशियर, झरने, मूल रूप से सब कुछ।  एक बार तो मैंने सोचा कि इन पहाड़ों पर गद्दियों की तरह एक पत्थर का घर बनाऊं और उन खूबसूरत झरनों को देखते हुए हमेशा वहीं रहूं।

कुंशा  

दोपहर 2 बजे हम भीम ड्वार पहुँचे और वहीं दोपहर का भोजन किया। भीम ड्वार पार्वती झरना के नीचे एक बड़ा कैंप है। पार्वती बाग में ठहरने की कम सुविधा होने के कारण अधिकांश लोग यात्रा के अंतिम चरण की शुरआत भीम द्वार से ही करते हैं। भीम ड्वार से पार्वती बाग़ 2-3 किमी दूर है लेकिन चढ़ने के लिए खड़ी चढ़ाई है। भीम द्वार से पार्वती बाग़ पर केवल एक टेंट दिखाई दे रहा था इसलिए मैं और गागा भीम ड्वार पर ही रात बिताने के पक्ष में थे। यात्रा से लौटने वालों ने भी हमे यही सलाह दी । लेकिन प्रवीण भाई के मन में कुछ और ही था. बातों बातों में उन्होंने पार्वती बाग़ पहुंचा ही दिया। बाद में यह एक बेहतरीन कॉल साबित हुई। अगली सुबह, हमने यात्रा के अंतिम चरण के लिए पहले ही 2-3 किमी की शुरुआत कर दी थी।

भीम ड्वार

पार्वती बाग से श्रीखंड टॉप - यात्रा का अंतिम चरण

हम शाम 5 बजे पार्वती बाग पहुँचे। रास्ते में हमें पता चला कि पार्वती बाग़ से श्रीखंड का मुख्य ट्रेक जो नैन सरोवर होकर जाता है, अधिक बर्फ होने की वजह से बंद है। इसलिए शॉर्टकट रास्ते से जाना पड़ेगा जिसमें ऊपर तक 80 डिग्री की चढ़ाई है और इस बार रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा भी नहीं है। सच कहूँ तो कोई रास्ता ही नहीं है। पहाड़ पर खड़ा ग्लेशियर है और गिरने की कगार पर है। यह शॉर्टकट कुल दूरी को 3-4 किमी कम कर देता है लेकिन बहुत जोखिम भरा है।

पार्वती बाग में अभी भी बहुत बर्फ थी। इस कारण वहाँ केवल तीन टेंट थे। इनमें से दो में खाने की कोई सुविधा नहीं थी. हम वहां एक टेंट के अंदर गए और पूछा कि क्या रात में रुकने और भोजन की सुविधा उपलब्ध है। टेंट मालिक प्रवीण भाई की कमेंट्री और सेराज कप का प्रशंसक निकला जाहिर है, हमें एक टेंट और कुछ कंबल मिल गए जो हमें कड़ाके की ठंड से बचाएंगे। ठण्ड इतनी थी की वहां चावल नहीं पक पा रहे थे।  ऊपर से तेज़ हवा। जिसके कारण मुझे बुखार और बहुत तेज़ सिरदर्द हो गया। बर्फ में कुछ तस्वीरें खींचने के बाद, मैंने टेंट के अंदर सोने जाने का फैसला किया। जब मैं अंदर था तब यात्रा से लौटने वालों को बर्फ में अपने डरावने अनुभवों के बारे में बात करते हुए सुन सकता था।

पार्वती बाग़

कुछ समय बाद, मैंने बाहर हाई टेस्टोस्टेरोन वाले बन्दे को सुना जो हमे थाचडू की चढ़ाई पर भी मिला था। वह यात्रा पूरी करके वापस जा रहा था। “6 बार यात्रा कर चूका हूँ पर इतनी कठिन यात्रा कभी नहीं हुई”.. उसने कहा। भाई साब इतने डिमोटिवेट हो गए थे की उन्होंने हमे पार्वती बाग़ से ही वापस जाने की सलाह दी। क्योंकि रास्ता बहुत जोखिम भरा है। उन्होंने हमें बताया कि एक आदमी है जो गंभीर रूप से घायल है और घंटों से बर्फ पर पड़ा हुआ है। ढलान अधिक होने के कारण बहुत लोग ग्लेशियर पर फिसल रहे थे और चट्टानों पर गिरकर घायल हो रहे थे। यही वह समय था जब चीजें मेरे लिए वास्तविक होने लगीं। कुछ समय बाद, गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को नेपालियों ने बचाया और एक कगार पर लाया। मैंने उसकी ओर देखने की जहमत भी नहीं उठाई, क्योंकि मुझे डर था कि इससे मैं डिमोटिवेट हो जाऊँगा। बाद में टेंट वालों ने बताया की वापस लौटते वक्त उस व्यक्ति की कुंशा में मौत हो गई।

सिरदर्द, बुखार और बाकी चढ़ाई के डर ने मुझे पूरी रात सोने नहीं दिया। मैंने सुबह 3:30 बजे का अलार्म लगाया था, लेकिन पूरी रात सो नहीं सका इसलिए मैं 3:30 बजे से पहले ही उठ गया और शेष चढ़ाई के लिए खुद को (मानसिक और शारीरिक रूप से) तैयार करना शुरू कर दिया। हम सुबह 4:00 बजे पार्वती बाग से निकले। सच कहें तो प्रवीण भाई और गागा को इस चढ़ाई में लोगों के साथ होने वाली घटनाओं का डर नहीं था. और ये दो लोग ही थे जिनकी वजह से मैंने पार्वती बाग़ से आगे जाने का फैसला किया। यह महत्वपूर्ण है कि ऐसी परिस्थितियों में आपके साथ मजबूत और निडर बन्दे हों।

पार्वती बाग़ से श्रीखंड की चढ़ाई 

जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे, चढ़ाई और बढ़ती जा रही थी। ऊपर से पिघलती हुई गीली बर्फ़। इस चढ़ाई पर फिसले तो आप कुछ सेकण्ड्स में पार्वती बाग़ मिलेंगे। तो हम सावधानी से PWD के दफ्तर में घूमती हुई फाइल की गति से ऊपर चढ़े। जब मैंने 500 मीटर नीचे से शिला को देखा तो सचमुच मेरी आँखों में आँसू गए। हम लगभग 5000m की ऊंचाई पर थे और अब ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी। यह मेरे जीवन में पहली बार था जब मुझे ऑक्सीजन की कमी का अनुभव हुआ। श्रीखंड महादेव बहुत नज़दीक थे लेकिन एक कदम चढ़ने के लिए एक किलोमीटर के बराबर का प्रयास लग रहा था। एक तो ऑक्सीजन की कमी ऊपर से पानी इतना ठंडा कि पिया नहीं जाए।  मैं हलके वज़न वाला आदमी हूँ, लेकिन यहां मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे 10 किलोग्राम और हल्का होना चाहिए था। किसी ने सच ही कहा था कि श्रीखंड महादेव उनके चरणों तक पहुँचने से पहले भक्त की परीक्षा लेते हैं और अंग अंग का खंडन करके हरिद्वार पहुंचा देते हैं। फिर वक्त आने पर जोड़ भी देते हैं।

समुद्र तल से 5000+ मीटर की ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन की वजह से स्ट्रगल करता मैं 

"जब तक अहम् नहीं टूटेगा तब तक दर्शन नहीं होंगे"... गागा ने कहा। जब 100 मीटर नीचे था तब लगा यहीं बैठ के प्राण त्याग दूँ। शायद यही वो क्षण था जब सारा अहम् टूट गया। लेकिन खड़े ग्लेशियर पर बैठने की जगह थी नहीं तो एक ही रास्ता था...ऊपर चढ़ने का।  बेहद ख़ुशी हैं की हम इस परीक्षा में पास हो गए। हम सुबह 8:15 बजे शीर्ष पर पहुँचे। पहुँचते ही गागा के अंदर का शायर बाहर आता हैं।

"चाँद का सहारा तू, सूर्य करे दीदार तेरा

क्या अहम्, क्या मैं और क्या ये संसार

खेल तेरा बनावट तेरी, शम्भू सब तेरा

सब तेरा”

"आग सी ज्वाला तू

सभी के दिल में बसने वाला तू

पवन का अहसास तू

जल की प्यास तू।"

हमने महादेव के सामने घुटने टेके और उनके चरणों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए धन्यवाद दिया और हमारी सुरक्षित वापसी के लिए भी प्रार्थना की। शीर्ष पर का दृश्य अद्भुत है। इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। बस यही कहूंगा की अगर धर्ती पर कहीं स्वर्ग हैं तो वो यही है। दूर दूर तक सिर्फ हिमालय नज़र आता है। मैंने हिमालय को इससे अधिक करीब से कभी अनुभव नहीं किया था। सारा शिव परिवार (पार्वती पर्वत, कार्तिकेय पर्वत, गणेश पर्वत) दिखाई दे रहा था।

कार्तिकेय पर्वत 

ठण्ड और कम ऑक्सीजन से दिमाग काम करना बंद कर चूका है। इसलिए मैं सुंदर दृश्य पर ठीक से ध्यान केंद्रित नहीं कर सका। थोड़ी सी वापस जाने की टेंशन भी थी क्यूंकि लगभग सभी चोटें और मौतें श्रीखंड से पार्वती बाग़ तक लौटते समय हुई हैं। हलांकि दूसरी तरफ प्रवीण भाई ऊपर के सारे कपड़े उतार कर हर हर महादेव वाली टी शर्ट पहन रहे हैं और व्लॉग के लिए वीडियोस बना रहे हैं। लेकिन इस बार रिटेक नहीं ले रहे क्यूंकि ठण्ड ज़्यादा है।हालत ऐसी थी की तस्वीरें खींचने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। धन्यवाद करता हूँ इन दोनों भाइयों का जिन्होंने  जबरदस्ती  मेरी कुछ तस्वीरें खींच ली नहीं तो दुनिया को कैसे बताता की श्रीखंड जाके आया हूँ। 

अधमरी हालत में कैलाश पर्वत पर मैं




पार्वती बाग तक वापसी का रास्ता और भी जोखिम भरा है। फिसल रहे थे और गिर भी रहे थे लेकिन महादेव के आशीर्वाद से हम सुरक्षित पार्वती बाग़ पहुँच ही गए। पार्वती बाग वापस पहुँचते ही महसूस हुआ की हमने कर दिखाया। पार्वती बाग़ पर सिगनल भी आ जाता है तो घर फ़ोन करके बता दिया कि ज़िंदा लौट आये।  लौटते समय जब हम कालीटोप पहुँचने वाले थे तो जिस चीज़ का इंतज़ार था वह गई। बारिश। हमने इसे हमारे लिए भगवान का रिटर्न गिफ्ट माना। हमने अपनी छतरियाँ और रेन कोट खोल दिए, जो अन्यथा बर्बाद हो जाते, अगर पूरी यात्रा के दौरान बारिश नहीं होती। वापस लौटते समय बराहटी नाले पर साधु महाराज अभी भी भांग के पकौड़े तल रहे थे और इस बार भी किसी को दे नहीं रहे थे।


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